राजनीति के आजातषत्रु अटल बिहारी बाजपेयी

 

डाॅ. सुभाष चन्द्राकर1, कु. देवश्री भोयर2

1सहायक प्राध्यापक, दुर्गा महाविद्यालय, रायपुर

2शोध छात्रा, दुर्गा महाविद्यालय, रायपुर

*Corresponding Author E-mail:

 

ABSTRACT:

अटलजी का व्यक्तित्व ऐसा नहीं हैं कि, उन्होंने अपनी पार्टी भाजपा तथा एन.डी.. से नेतृत्व प्राप्त करने के लिए कोई गुटबंदी का सहारा लिया हो। वास्तव में तो वे अपनी पार्टी तथा राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन के एक ऐसे नेता हैं जिनको आजातषत्रु कहा जा सकता है।

 

KEYWORDS: राजनीति, आजातषत्रु, अटल बिहारी बाजपेयी

 

 


प्रस्तावना

अटल जी सही मायने में राजनीति के आजातषत्रु थे, आज वे हमारे बीच नहीं है, परन्तु उनका बेदाग जीवन, विचार, संसदीय जीवन उनकी कार्यपद्धति, विपक्ष के नेता के रूप में उनकी भूमिका, भारत के जननेता, विदेष नीति, उनका वक्तृत्व कला, उनके रसभरे जीवन, उनकी वासंती भाव-भंगिका आदि का भारत के जन-मानस पर अमिट छाप पड़ चुका है। प्रस्तुत शोध आलेख में उनके जीवन के महत्वपूर्ण प्रसंगों पर प्रकाष डालने का प्रयास किया जा रहा है।अटल जी ने राजनीतिक जीवन में काफी उतार-चढ़ाव देखे थे। जनता सरकार में जब वे विदेष मंत्री थे, तब उन्होंने और श्री लाल कृष्ण आडवाणी ने इस बात का भरसक प्रयास किया कि

 

 

जनता पार्टी टूटे नहीं परन्तु कुछ विघ्नसंतोषी लोगों ने उनके ऊपर दोहरी निष्ठा का आरोप लगाते हुए जनता पार्टी को तोड़ दिया और अब भी इस प्रकार के प्रयास ऐसे कुछ लोगों द्वारा किए जा रहे है कि भाजपा और अटलजी का छिपा हुआ भगवा एजेंडा हैं और ऐसे ही लोग प्रयास कर रहे हैं कि इस बात को लेकर राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन भी टूट जाए।

 

परन्तु अटलजी के व्यक्तित्व के सामने बाकी सब व्यक्ति दल बौने दिखते हैं। अटलजी का यह व्यक्तित्व अल्प समय में नहीं बना है, उनकेविद्यार्थी जीवन संघके संस्कार हैं, जिस कारण वे एक कुषल संगठक और सबको साथ लेकर चलने वाले व्यक्ति हैं। पद की इच्छा होने के कारण उन्होंने पहली बार सन् 1996 में बहुमत होने से इस्तीफा दिया और दूसरी बार सन् 1998 में एक मत से सरकार चली गई तो इस्तीफा देने में विलंब नहीं किया और ही जोड़-तोड़ की राजनीति कर अपनी सरकार को बचाने का प्रयास किया।

 

 

अटलजी का व्यक्तित्व ऐसा नहीं हैं कि, उन्होंने अपनी पार्टी भाजपा तथा एन.डी.. से नेतृत्व प्राप्त करने के लिए कोई गुटबंदी का सहारा लिया हो। वास्तव में तो वे अपनी पार्टी तथा राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन के एक ऐसे नेता हैं जिनको आजातषत्रु कहा जा सकता है।

 

श्री नरसिंहाराव के जमाने में हुए विष्व व्यापार संघ के समझौतों को तोड़ना श्री अटलजी पसंद नहीं करते थे, क्योंकि इसमें देष की विष्वसनीयता का सवाल है, दूसरी ओर स्वदेषी जागरण मंच द्वारा उनके ऊपर आए दिन दबाव बढ़ता रहता था परन्तु ऐसे में अपने और पराए के बीच में संतुलन बनाए रखना यह अटलजी की कार्यषैली की अपार सफलता है। इतनी सारी कठिनाइयों के होते हुए भी उन्होंने पोखरण में परमाणु परीक्षण और कारगिल का युद्ध जीतकर देष का गौरव बढ़ाया है और अमेरिका जैसे राष्ट्र को बाध्य किया है कि वह भारत के साथ मित्रता करें। आतंकवाद के विरूद्ध एक अंतर्राष्ट्रीय मोर्चा बनाने की सफलता का श्रेय भी श्री अटलजी को जाता है। दुनिया के किसी भी देष को यह ईष्र्या हो सकती हैं कि उसके देष का प्रधानमंत्री यदि हो तो अटलजी जैसा हो। अटलजी ने दुनिया में स्वयं के व्यक्तित्व के बजाय भारत के गौरव को बढ़ाने का ही प्रयास किया हैं और कवि की उस पंक्ति को साकार किया है। जिसमें कहा गया हैतेरा वैभव अमर रहे माँ हम दिन चार रहे रहें।

 

श्री अटलजी जैसा व्यक्ति ज्यादा से ज्यादा लोगों को साथ लेकर चल सकते हैं। अटलजी स्वभाव से ही परदुखकातरता हैं। कठिनाई में पड़े व्यक्ति के प्रति वे अति संवदेनषील हैं। अटलजी को कोई प्रलोभन कोई आकर्षण उन्हें पथ से विचलित नहीं कर सकता। कोई कष्ट या कठिनाई या संकट उन्हें भयभीत कर विपथगामी नहीं बना सकता। उन्होंने जब उद्घोषणा किया था, कि भारत को कोई माई का लाल खरीद नहीं सकता, तब वे शब्दों का छलावा नहीं करते। अपने अडिग स्वभाव को ही अभिव्यक्त करते हैं। उनकी सरकार पर संकट था। उसे वे सांसदों की खरीद-फरोख्त कर आसानी से बचा सकते थें। उन्होंने इस बारे में काँग्रेस नेतृत्व का अनुकरण नहीं किया था। सरकार को गिर जाने दिया। सत्ता में बने रहने का इतना आकर्षण भी उन्हें आदर्षो से डिगा पाया।

अटलजी का वास्तव में उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी तथा उनका लोगों से संबंध बनाये रखने का अलग ही नतीजा है। उनके सार्वजनिक जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि हैं उनका किसी भी विवाद से परे रहना। मोरारजी देसाई की सरकार में एक विदेष मंत्री की हैसियत से उन्होंने जैसा काम किया वह प्रमाण है, उनके ऐसे व्यक्तित्व का जिसमें देष का हित पार्टी हितों से सर्वोपरि हैं। पर मुख्य तौर से उनकी स्वच्छ एवं ईमानदार छवि उनका सबसे बड़ा गुण है।

 

जार्ज फर्नाडीस ने अपने लेख में लिखा है कि अटल जी में विद्धता और देषप्रेम के दर्षन होते हैं। अपने भाषण में उन्होंने बताया हैं कि श्री अटल बिहारी बाजपेयी उन अग्रणी सांसदों में से एक हैं, जिनका किसी मुद्दे को सामने रखने, भाषा का सटीक प्रयोग करने तथा मुद्दे के प्रति ईमानदारी बरतने में एक अलग ही अंदाज था। एक वक्ता के रूप में वे अद्धितीय है। अतः उनकी वाक्षैली को सुनने का अलग ही मजा है।

 

संसद वह स्थान हैं जहाँ देष के सामने बड़े मुद्दे रखे जाते हैं तथा संसद संसद के बाहर उन मुद्दों पर कार्रवाई जारी रखी जाती हैं। मधु लिमये, ज्योति बसु और फिरोज गांधी के राजनीतिक जीवन में यह कार्यषैली प्रमुख रही हैं, पर अटलजी की कार्यषैली इनसे अलग हैं।

 

वे सत्ता के केन्द्र के व्यक्तियों, अमीरों या दोनों के द्वारा की जा रही अनियमितताओं को सदन में नहीं रखते, पर इससे उनका कद छोटा नहीं हो जाता। जो उन्होंने एक वक्ता के रूप में हासिल किया हैं। यह कहा जाता रहा हैं कि श्री अटल बिहारी बाजपेयी पार्टी के लोगों को सहज स्वीकार्य हैं। ऐसा नहीं कहाँ जा सकता कि अटलजी को माक्र्स वादियों और कांग्रेस जैसी पार्टीयों ने उनको कभी नकारा नहीं वे हमेषा अटलजी का समर्थन करते रहें और उनके द्वारा सदन में दिये गये भाषण को सदैव ध्यान से सुनते रहें।

 

उनकी यह छवि कि वे सदन में तथा बाहर सभी को स्वीकार्य हैं। वास्तव में उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी तथा उनका लोगों से लगातार संबंध बनाए रखने का नतीजा है।

 

उनके सार्वजनिक जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि हैं उनका किसी भी विवाद से परे रहना। मोरारजी देसाई की सरकार में एक विदेष मंत्री की हैसियत से उन्होंने जैसा काम किया, वह प्रमाण हैं उनके ऐसे व्यकितत्व का जिसमें देष का हित पार्टी हितों से सर्वोपरि हैं पर मुख्य तौर से उनकी स्वच्छ एवं ईमानदार छवि उनका सबसे बड़ा गुण है।

 

अटलजी का दृष्टिकोण हमेषा सकारात्मक रहा हैं। राष्ट्रीय हित उनके समझ सर्वोपरि रहा है। संसद में वाद-विवाद का उच्च स्तर स्थापना और सदन की गरिमा और षिष्टाचार की रक्षा में सदा अग्रणी रहें। उन्होंने हमेषा जन साधारण की अपेक्षाओं को पहचाना हैं। उनमें विचार के संप्रेषण की अपार क्षमता थी।

 

अटलजी के राजनीतिक जीवन का ज्यादातर समय विपक्षी दल की कतारों में बैठकर ही गुजर गया। लंबे समय तक विपक्ष की पंक्तियों में बैठने वाले लोगों का अधिकतर निंदा करने का स्वभाव बन जाता है। नकारात्मक सोच उनका एक अंग बन जाती हैं। लेकिन यह बात अटलजी पर लागू नहीं होती है उनकी काम करने की भावना हमेषा दलगत राजनीति से अलग रही। कई बार उन्होंने सरकारी कामकाज की आलोचना की लेकिन कभी किसी पर नीजि हमला नहीं किया और अगर ऐसी कोई बात भी होती तो उन्होंने किसी द्वेष की वजह से ऐसा नहीं किया। उनके व्यंग्य और कटाक्ष किसी को अटपटा तो महसूस करवा सकते हैं लेकिन किसी को घायल नहीं करते थे।

 

अटलजी का अप्रतिम वक्तृत्व कला और व्यंग तथा चुटकियाँ श्रोता को मंत्र-मुग्ध कर देती थी। उनकी गंभीरता, धैर्य, दूरदृष्टि और तथ्यों-आँकड़ों से परिपुष्ट तर्कषैली सुनने के बाद सभी लोगों का मन अभिभूत हो जाता था। अटलजी आलोचना अथवा चेतावनी का अवसर आने पर दो तरफा बातें कहने से कभी नहीं चूके। हितकर कहने के लिए सदा आगे रहें हैं और हित को ओझलकरप्रीतिकरकहने में कभी रूचि नहीं रही। दूसरी ओर प्रतिपक्षी की तर्क संगत बात को सहर्ष स्वीकार किया।

 

राजनेता सिर्फ आज की बात सोचते थे। जबकि राजनीति-विषारद पीढ़ियों का विचार करते थें। अटलजी विषारदों की श्रेणी में आते थें। यह तथ्य उनके भाषणों से असंदिग्ध रूप से स्पष्ट हो जाता था। उनके भाषणों को पढ़कर सभी लोगों के मन में यह विचार उठे बिना नहीं रहता कि काष! उनके सुझावों, चेतावनियों और प्रस्तावों पर समय रहते ध्यान दिया गया होता तो देष इस संकटपूर्ण राजनीतिक-आर्थिक दुरावस्था में उलझा होता। एक व्यक्ति के रूप में वह अत्यंत संवेदनषील और उदारमना थे। सहायता और सहयोग चाहने वाले को कभी खाली हाथ नहीं लौटाते थे। बहुत कम बोलते थें परन्तु जो बोलते थे वह हृदय को स्पर्ष करते थें। अटलजी सामूहिम निर्णय में विष्वास करते थें। किसी भी सार्वजनिक मुद्दे पर व्यक्तिगत राय भले ही कुछ रखते थें, निर्णय वही मानते थे जिस पर सब मिल-जुलकर पहुँचे थे। अपने विरोधियों के प्रति उनका रवैया काफी गरिमापूर्ण था।

 

जे.आर.पावगी द्वारा लिखे लेख वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि में उन्होंने बताया हैं कि प्रारम्भ से ही बाजपेयी जी की ख्याति एक उदारवादी और संवेदनषील नेता की रही हैं। भारत जैसे विषाल देष और संसार के सबसे बड़े लोकतंत्र को अरसे से एक ऐसे नेता की तलाष थी, जिसे केवल बहुसंख्यक हिन्दुओं का विष्वास प्राप्त हो अपितु देष के अल्प समुदायों को भी सहज रूप से स्वीकार्य हो।

 

श्री बाजपेयी जी के रूप में देष को ऐसे नेता प्रधानमंत्री की प्राप्ति स्वतंत्रता के बाद की विषिष्ट उपलब्धि हैं। नेहरू-गांधी परिवार का देष के प्रधानमंत्री पद पर एकाधिकार तो समाप्त हो गया, परन्तु कोई ऐसा नेता सामने नहीं सका जिसमें सबको साथ लेकर चलने टिके रहने की क्षमता और पर्याप्त सूझबूझ राजनीतिक दूरदर्षिता हो। अपनी नीतियों और कार्यों के कारण पतनोन्मुख काँग्रेस के विकल्प के रूप में आगे तो अपने को दिग्गज समझने वाले कई नेता आए पर वे जनता की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे और अल्प समय में ही विस्मृत होने लगे।

 

अटलजी की संवदेनषीलता केवल काव्य तक ही सीमित नहीं, सामाजिक और राजनीतिक जीवन में भी प्रत्येक व्यक्ति के प्रति उनका स्नेह और आत्मीयता उनकी लोकप्रियता को और बढ़ाती हैं। प्रत्ये कार्यकर्ता को जो उनके संपर्क में आया उसे हमेषा नाम से बुलाते हैं और कुषलक्षेम पूछते थें, प्रधानमंत्री बन जाने के बाद भी उनमें अहंकार तो लेषमात्र भी नहीं था। लखनऊ के कार्यकर्ताओं को तो उनकी इस आत्मीयता का बोध सदैव ही होता रहता था।

 

अटलजी द्वारा दिये गये भाषण और उनके द्वारा बोले गये शब्दों को सुनने का एक अलग ही आनन्द था। जब वे सत्ता से दूर थे उस समय भी अटलजी की सभा में लाखों लोग जुटते थे। ओज, तर्क और हास्य-व्यंग्य का अद्भुत मेल उनके भाषण में देखने को मिलता है। और लोग उनके भाषण को मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहते थे। स्वतंत्रता के पूर्व जिस तरह नेहरू जी जन आकर्षण के केन्द्र थे। स्वांतत्रयोत्तर काल में वैसी ही लोकप्रियता बाजपेयी जी ने अर्जित की हैं।

 

बाजपेयी एकस्थितप्रज्ञ नेता थे। सावन हरा भादो सूखा। असफलता, निराषा को उन्होंने लंबे समय तक झेला, लेकिन चेहरे पर कभी मुसकान का अभाव नहीं रहा। गंभीर से गंभीर समस्या हो परन्तु निर्विकार भाव और मृदुहास्य उनके मुखमंडल पर झलकता हैं। केलव 13 दिन प्रधानमंत्री रहकर पद छोड़ते समय भी उनके चेहरे पर हताषा निराषा का भाव नहीं दिखाई पड़ा। एक अच्छी खासी काम कर रही सरकार को जयललिता अपने स्वार्थवष अस्थिर करती रही, परन्तु सत्ता का मोह त्यागकर दृढ़ता का अपूर्व प्रदर्षन करते हुए उन्होंने जयललिता के दबाव को स्वीकार नहीं किया। अप्रैल 1998 में सभी विपक्षी दलों ने एकजुट होकर शड्यंत्रपूर्वक बाजपेयी सरकार को गिराने में कोई कसर नहीं छोड़ी, फिर भी सरकार मात्र एक वोट से गिर सकीं। यदि बाजपेयी सिद्धांतों और आदर्षो की बली देते हुए परदे के पीछे समझौता कर लेते तो सरकार आसानी से बच सकती थी परन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया और पद का त्याग कर दिया। जबकि पूरा देष उन्हें ही प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहता था। उनकी कार्यषैली, दृढ़ता और उच्च राजनीतिक चरित्र के प्रदर्षन का परिणाम यह हुआ कि अक्टूबर 1999 में वे प्रबल जनसमर्थन के बल पर पुनः प्रधानमंत्री बने और देष का बागडोर अटलजी के हाथों में थी।

 

कष्मीर को लेकर पाकिस्तान स्वतंत्रता के ठीक बाद अक्टूबर 1948 से ही प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से संघर्षरत हैं। वास्तव में पाकिस्तान की नीति ही भारतवासियों को चैन से जीने देने की रही हैं। पाकिस्तान के मामले में बाजपेयी ने सौहार्द्ध उत्पन्न करने के प्रयासों के साथ ही जबरदस्त दृढ़ता और शक्ति का प्रदर्षन किया हैं। भारत को धमकाने की नीयत से पाकिस्तान ने चीन की सहायता से परमाणु बम बना लिया। इससे षक्ति संतुलन बिगड़ गया और भारत के लिए खतरा बढ़ गया। श्रीमती इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में सन् 1974 में पोखरण में भारत ने परमाणु परीक्षण किया। परन्तु विदेषी दबाव के चलते परमाणु परीक्षण करने के आदेष देने का साहस तो इंदिरा गांधी जी और उनके बाद कोई प्रधानमंत्री दिखा सका। परन्तु इन दबावों की परवाह कर बाजपेयी जी ने परमाणु परीक्षण का ऐतिहासिक निर्णय लिया और 11 मई 1998 को भारत के वैज्ञानिकों ने पुनः पोखरण में परीक्षण किया। यह परीक्षण पूर्णतया सफल रहा और भारत परमाणु शक्ति संपन्न देषों की पंक्ति में खड़ा हुआ। इस परीक्षण से चिढ़कर अमेरिका सहित कई देषों ने भारत पर आर्थिक अन्य प्रतिबंध लगाए।

 

बाजपेयी जी सरकार अविचलित रही। बाद में उन देषों ने भारत की षक्ति संतुलन की आवष्यकता को समझा और ये प्रतिबंध क्रमषः तिरोहित होते गए। यह उनकी बड़ी कूटनीतिक विजय हैं।

 

भारत ने षांति प्रयासों का मार्ग फिर भी नहीं छोड़ा और षक्ति-युक्ति दोनों को चरितार्थ करते हुए बाजपेयी ने लाहौर की बस से यात्रा कर पाकिस्तान की ओर मित्रता का हाथ पुनः बढ़ाया। भारत पाकिस्तान के बीच षांति का यह प्रयास अभूतपूर्व था। परन्तु पाकिस्तान तो पाकिस्तान ही है। इस दौरान पाकिस्तानी सेना गुपचुप रूप से कष्मीर के कारगिल क्षेत्र में प्रवेष कर गई। जानकारी होते ही मई 1999 में बाजपेयी जी ने असामान्य दृढ़ता का परिचय देते हुए सेना को पाकिस्तानियों को खदेड़ने का आदेष दिया। दो माह के भयंकर संघर्ष के बाद भारतीय जवानों ने अपूर्व बलिदान देकर पाकिस्तानियों को भारी क्षति पहुँचाते हुए खदेड़ दिया। भारतीय सेना की वीरता का यह गौरवपूर्ण अध्याय हैं। जो अटलजी के नेतृत्वकाल में लिखा गया। समस्याओं से अटलजी कभी घबराते नहीं सदैव चेहरे पर सौम्यता और मृदु हास्य और संकट के समय व्यवहार में दैनयं पलायनम्ऐसे अद्भूत व्यक्तित्व के धनी प्रधानमंत्री को पाना वास्तव में स्वतंत्रता के बाद की महान उपलब्धि हैं।

 

संदर्भ ग्रन्थ सूची

1.   बाजपेयी अटल बिहारी - मेरी संसदीय यात्रा खण्ड 1 से 4 प्रभात प्रकाषन नई दिल्ली 2004

2.   बाजपेयी अटल बिहारी - गठबंधन की राजनीति प्रभात प्रकाषन नई दिल्ली 2006

3.   त्रिवेदी विजय - हार नहीं मानूँगा हार्पर कांलिंस पब्लिषर्स 2016

4.   आडवानी लालकृष्ण - माई कण्ट्री माई लाइफ, रूपा एण्ड कम्पनी 2005

5.   झा प्रभात - हमारे अटल जी प्रभात प्रकाषन नई दिल्ली 2015

 

 

 

Received on 15.01.2019            Modified on 18.02.2019

Accepted on 22.04.2019            © A&V Publications All right reserved

Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(2):469-473.